स्मृतियां
जोड़ती हैं स्मृतियांµ
आदि और अंत को
इच्छा और अनिच्छा को
सद् और असद् को
कायरता और साहस को
और उजासी आती है उनसेµ
कोई अभिप्सा
जिनसे बनते हैं हम और तुम
और हमारी अभिप्सित इयत्ताएं
जिनमें नदारद हैं सभी तरह के
दुनियावी संबंध और संबोधन
जहां वायवीय भी कुछ नहीं
जहां मिलती ह....
