काश! कह देते
जरूरतें फिक्रमंद हो जाती थीं तुम्हारी
जब बढ़ जाती थीं मेरी ख्वाहिशें
अपनी जरूरतों, हसरतों को संभाले
जेब के किसी कोने में
निकल पड़ते थे तुम घर से
बाजार की तरफ
मेरे अरमानों को साधने
मेरी जरूरतें रोक लेती थीं तुम्हारा हाथ
अपनी किसी खुशी को पाने से
किसी जरूरतमंद की मदद करने से
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