नंदा पांडेय

नंदा पांडेय की कविताएं

अप्प दीपो भव 

हां!
तुम डरती हो
अपनी ही वर्जनाओं से
जब तुम्हारे अंदर इतना ओज है 
फिर क्यूं सुलगना
बोरसी की आंच बनकर 

तुम्हें पता है
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला कि भीतर तुम्हारे
क्या जल और सीझ रहा है
फिर भी सुलग रही हो दिन-रात

तुम जानती हो 
कि तुम्हारे देह की भाषा में दिखता है
तुम्ह....

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