देह के आकाश को सुहानी रात में देखने पर सपनों के असंख्य छोटे-छोटे तारे टिमटिमाते नज़र आते हैं। मन को बांध लेने वाला यह तन, बिना छुए ही, बिना बोले ही सृष्टि में घटित हो रही तमाम क्रियाओं और उपस्थित सभी अस्तित्वों में सबसे अपना, सबसे क़रीबी लगता है।
क्या देह को एक झटके में ख़ुद से अलग रखकर अपने आरंभ और अंत की कल्पना की जा सकती है? प्रेम की कल्पना की जा सकती है? देह को अनुभव कर....
