राजेंद्र राजन

महज किताबों में सिमट कर रह गए प्रेमचंद!

‘मुंशी प्रेमचंद के जन्म माह के अवसर पर पाखी इस विशेष यात्र-संस्मरण को प्रकाशित कर रही है, जिसमें एक लेखक ने लमही की उस मिट्टी को छूने की कोशिश की है, जहां से प्रेमचंद का जीवन और लेखन जन्मा। यह संस्मरण बताता है कि आज जब वाराणसी महानगर लमही को लील रहा है, तब भी कुछ लोग हैं जो प्रेमचंद को पूरे मन से याद करते हैंµशिद्दत से, आत्मीयता से।’
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