विश्वनाथ त्रिपाठी एक ऐसे आलोचक हैं, जिनके कई वैचारिक और वैध आग्रह रहे हैं। इसके बावजूद किसी रचना में निहित मानवीयता और मर्म को वे बारीकी से पकड़ते है। उनकी यह खूबी उनकी रचनात्मक और उनके आलोचकीय लेखन में दोनों में आसानी से दिखती है। हरिशंकर परसाई के कृतित्व पर केंद्रित उनकी किताब ‘देश के इस दौर में’ भी उनके आलोचना के इस वैशिष्ट्य को आसानी से महसूस किया जा सकता है।
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