सुधीश पचौरी

कुछ छूटी हुई बहसें और कुछ बातें हिंदी साहित्य के बीते सत्तर बरस

जैसा कि हमने कहा, आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास बहुत कुछ लेखकों की 'एषणा’ और 'प्रेषणा’ के द्वंद्व के फलस्वरूप विकसित हुआ है। यह अलग बात है कि इस 'एषणा’ और 'प्रेषणा’ का एक 'सामाजिक’ (सोशल) भी रहा!

अगर हमारी वामपंथी आलोचना में और कथित 'कलावादी आलोचना’ में 'एषणा’ (कवि बनने की या कविता करने की कामना) के तत्व को छिपाकर, साहित्य का सिर्फ 'सोशल’ देखा जाने लगा तो उसका ए....

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