हालांकि मैंने पे्रमजी को दिल्ली आने के बाद ही देखा- सुना था, पर आज आंख मूंदकर सोचती हूं तो हूक उठती है कि मेरे चार साल बाद मुझसे करीब अस्सी किलोमीटर दूर जन्मे बिहार के इस तेजस्वी युवक को मैंने तबसे क्यों नहीं जाना जब
1.यह फौजी पिता की विभिन्न पोस्टिंगों पर अलग-अलग स्कूलों में पढ़ रहा था जहां वाचनालयों में विज्ञान की किताबों में छुपाकर साहित्य की किताबें पढ़ने और बहन को पढ़ाते हुए उ....
