पल्लवी मुखर्जी

सुनो मछुआरे

सुनो मछुआरे
जितने जुगनू
तुम्हारी आँखों में
चमक रहे हैं न
टिम-टिम
तारों के जैसे

वें क्या
हमेशा चमकते रहते हैं
इसी तरह

सुनो मछुआरे
जब तुम
जाल फेंकते हो
सागर में
तुम्हारी बाहों की मछलियां
मचल-मचल जाती हैं

सुनो मछुआरे
इतनी शिद्दत
कहाँ से लाते हो तुम?
जबकि
तुम्हारे घर के चूल्हे की आँच
जलती है धीरे-धीरे
और ढिबर....

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