गोविन्द उपाध्याय

  गुनाहगार

रात के सात बज चुके थे । देव मुखर्जी का पूरा ध्यान मुख्यद्वार के गेट पर था । गेट के बाहर कुछ देखने का प्रयास कर रहे थे । स्ट्रीट लाईट कई दिनों से बंद थी । इसलिए काले घने अंधेरे के सिवा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था ।  देव मुखर्जी मोबाइल निकाल कर एक बार फिर दीपाली का नम्बर मिलाने लगें, लेकिन दीपाली का फोन स्वीच ऑफ बता रहा था । वे कुर्सी से उठकर कमरे में टहलते हुए  बड़बड़ा्ने लगें, “ ....

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