आधुनिक हिंदी आलोचना के भीष्म पितामाह आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ 1929 ई- के ‘आधुनिक गद्य साहित्य परंपरा का प्रर्वन’ प्रथम उत्थान (1858 ई- 1839 ई-) प्रकरण। सामान्य परिचय देते हुए लिखा है:
‘भाषा का स्वरूप स्थिर हो जाने पर जब साहित्य की रचना कुछ परिमाण में होती है। तभी शैलियों का भेद, लेखकों की व्यक्तिगत विशेषताएं लक्षित होती हैं।
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