प्रेम गुप्ता ‘मानी’

गृह-रुदन

बाहर तन को सकून देने वाली दिसंबर की गुनगुनी धूप पसरी हुई थी, पर अन्दर तपता हुआ रेगिस्तान था। उसकी अंगार-सी दहकती बलुई ज़मीन के अन्दर तक धँसा था मकान...। चलने से तो सिर्फ पाँव में ही छाले पड़ते हैं पर मकान के तो पूरे अस्तित्व पर ही जैसे छाले फूट आए थे...और अब उनकी टीसनसे उसका पोर-पोर दुख रहा था... ।
इस बंजर, तपती हुई बलुई ज़मीन पर यूँ चलने का कोई कारण...? हाँ...कारण शाश्वत था और चाहने पर ....

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