ज्योति चावला

मेरे समय की भाषा

मेरे समय की भाषा विस्मृति से गुजर रही है
वह भूल गई है कि हमारे पुरखों  ने रखे हैं
अपने समय के सबसे नुकीले सच
भाषा के गर्भ में
और जन्मी हैं न जाने कितनी विद्रोही कविताएं
जिन्होंने रास्ता दिखाया है
जब अंधेरा सबसे अधिक घना था
मेरे समय की भाषा ने ओढ़ ली है मृत देह की सी ठंडक
अब नहीं उपजती कोई उष्मा उससे
नहीं तो क्रूरता के इस अट्टहास को देख 
दौड़....

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