फ़िराक़ साहब का एक मशहूर शे’र है-
सब मरहले हयात के तय करके अब फ़िराक़ ,
बैठा हुआ हूं मौत में ताख़ीर देखकर।
यह हमारे समय का विपर्यय है कि कहां फ़िराक़ साहब मौत के इंतजार में हो रही देरी देखकर उद्विग्न थे और आज कहां मौत हमारा इंतजार कर रही है!
मानव-सभ्यता के क्रमशः विकास के लाखों वर्ष के इतिहास में संभवतः ऐसा समय कभी नहीं आया कि एक बहुरू....
