वे अब मात्र अठारह सौ सत्तावन लोग बचे थे। तीस लाख की आबादी वाले शहर में यूं तो यह कोई बड़ी संख्या न थी पर अपने आप में मायने रखती थी। मायने इसलिए भी कि उन पर, आस-पास वालों की, पार्टियों के कार्यालय, सरकारी महकमे की, पीर-पुजारियों की, सभी की नजर थी।
ऐसा नहीं था कि इनमें से कुछ सरकारी नौकरियों में नहीं थे पर उन्हें वैल्यू ऐड करने लायक जिम्मेदारियां दी ही नहीं गईं थीं। à¤....
