पुरानी, टूटी-फूटी सड़क पर बूढ़ा धीरे-धीरे चल रहा था। हर कदम पर पैरों के निशान पड़ रहे थेµकुछ गहरे, कीचड़ में धंसे हुए, कुछ हल्के, रेत पर मुश्किल से दिखाई देते। ठंडी हवा में पेड़ों की सरसराहट थी, मानो वे भी इस सड़क की कहानी सुन रहे हों। तभी दौड़ता हुआ आया सात-आठ साल का बच्चा, आंखों में जिज्ञासा भरी। ‘दादा जी, ये निशान क्यों अलग-अलग हैं? कोई गहरा, कोई हल्का’ बूढ़े ने ठहरकर स....
