जिससे उम्मीदें-जीस्त थी बांधी
ले उड़ी उसको मौत की आंधी
गालियां खाके गोलियां खा के
मर गए उफ्रफ! महात्मा गांधी!
-रईस अमरोहवी
(1)
दिल्ली में वह मावठ का दिन था। 30 जनवरी, 1948 को दोपहर 3 बजे के आस-पास महात्मा गांधी हरिजन-बस्ती से लौटकर जब बिड़ला-हॉउस आए तब भी हल्की बूंदाबांदी हो रही थी।
लंगोटी वाला नंगा फकीर थोड़ा थ....
