कांताबाई स्कूल में मिड-डे मील की रसोइया थी। खाने को देखकर आज फिर उसका मन बड़ा ही
उदास था।
पतली दाल और पानीदार सब्जी बच्चों के आगे परोसने में उसकी आत्मा गवाही नहीं देती थी। लेकिन जितने संसाधन उसे उपलब्ध कराए जाते थे उसमें वही बन सकता था।
दीनदयाल मास्टर साहब रसोई की तरफ आए तो कांताबाई ने कहाµ‘मास्टर साहब यह बच्चों को हम लोग क्या खिला रहे हैं--- इससे इनको क्या प....
