महेश कुमार केशरी

महेश कुमार केशरी की कविताएं

उर्वरता 

ये रोपन का सीजन है 
अषाढ़ बीत चुका है
और हुई है एक स्त्री रजस्वला! 
ये गर्भ धारण का समय है 
धरती का 
रजस्वला स्त्री हुई है गर्भवती 
सावन का इस तरह हरा होना
दरअसल रजस्वला होना है प्रकृति का!
रिमझिम फुहार का होना दरअसल 
मादकता भरना है प्रकृति में 
धसक रहा है सावन 
हंस रही हैं स्त्रियां  
गा रही हैं ग....

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