रजनी गुप्त

चक्करदार सीढ़ियां

रोजाना पंछियों का वही समूहगान, फिर उसी अनंत आसमान में उड़ान भरते देखते हुए नियति का मन उचाट हो गया। समय के चलते पहिए की तरह हर रोज उगते, फिर अस्ताचल की तरफ जाते सूरज को देखते हुए वह सोचती रही, क्या उसका जीवन भी ऐसे ही बीत जाएगा, दफ्रतर के बंधे-बंधाए रूटीन जैसा एकरस, फिर भी भरा भरा? दफ्रतर में बिताए वे लम्हे, ---क्या तो चमकीले सुनहरे दिन थे वे, जब वह नौकरी में थी। लोगों की....

Subscribe Now

पाखी वीडियो


दि संडे पोस्ट

पूछताछ करें