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हरीश के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था। जिंदगी का एक बड़ा भाग सरकारी आवास में गुजार कर आए थे। पारिवारिक जिम्मेदारी कुछ ऐसी रही कि चाहकर भी अपने लिए घर नहीं ले पाए। नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद महानगर में अपनी इकलौती संतान दामिनी के पास आ गए। सुबोध किसी मल्टीनेशनल में नौकरी करते थे। सुबह आठ बजे घर से निकलते और रात को आठ बजे तक घर आते थे। यूं तो उनकी नौकरी मात्र आठ घं....
