कितना समझा चुकी है कविताएं
सदियों से संघर्षरत हैं कविताएं
सर्वस्व करने को न्योछावर
कलम और दवात को साथ लेकर
आंदोलन करने चली आई है कविताएं
कभी रक्त लिखकर
कभी प्रेम लिखकर
कभी युद्ध और दहशत
डराने को नहीं
सुलझाने को आदमी
आदमी है कि सुलझता कम है
उलझता ज्यादा है
पाने की होड़ में शामिल
