विशाल मिश्र

मशीनें सोचने लगीं

डॉ. आभा शर्मा अपनी प्रयोगशाला की खिड़की से बाहर देख रही थीं। शहर की धीमी होती धड़कन और ढलती शाम की रोशनी में उन्हें भविष्य की एक झलक दिखाई दे रही थी। वह जानती थीं कि उन्होंने सिर्फ एक मशीन नहीं बनाई है, बल्कि एक ऐसे दिमाग को आकार दिया है जो शायद इंसानों की तरह महसूस कर सके। उनकी नवीनतम रचना, ‘सारथी’, मेज पर रखी थी, जिसकी नीली आंखें अभी भी बंद थीं।
तभी, कमरे की शां....

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