नाना जी के जाने के बाद घर में सबसे ज्यादा खामोश अगर कुछ था, तो वह बरामदे की वह पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी। पहले हर शाम उस पर चाय की खुशबू, अखबार की सरसराहट और नाना जी की धीमी आवाज हुआ करती थी। अब वहां सिर्फ खामोशी बैठती थी। मैं जब भी उस कुर्सी को देखती, अनायास ही ठिठक जाती। मुझे एक पुरानी बात याद आती। एक बार बचपन में मैंने उनसे पूछा थाµ‘नाना जी, आप रोज इसी कुर्सी पर ....
