‘मैं नहीं मानता कि कहानी को परखने का कोई निश्चित प्रतिमान होता है, जिसके आधार पर कहानियों का मूल्यांकन आंख मूंदकर किया जा सकता है। मेरा मानना है कि हर कहानी अपने मूल्यांकन के प्रतिमानों को अपने पाठ में छिपाए रखती है। आलोचक कहानी के पाठ से उन कारकों या तत्वों की शिनाख्त भर करता है, जिससे वह कहानी उल्लेखनीय हो पातीं है। बावजूद इसके एक लंबे समय तक जब आप कहानियां....
