शहर का नाम अब शायद नक्शों में भी ठीक से नहीं बचा था। रेलवे स्टेशन के पीले बोर्ड पर लिखे अक्षरों का रंग उतर चुका था और बरसात में ‘नूराबाद’ का ‘नू’ हर साल थोड़ा और धुंधला पड़ जाता था। लोग मजाक में कहते-‘अब तो बस ‘राबाद’ बचा है।’
लेकिन शहर कभी ऐसा नहीं था।
कभी यहां शामें बहुत लंबी हुआ करती थीं। इतनी लंबी कि दुकानदार रात को गल्ला बंद करते हुए सामने वालà....
