धनेश दत्त पांडेय

चलती चक्की देख कबीरा रोया

सोमवार और मंगलवार की दरम्यानी रात। यह 14 सितंबर, आश्विन शुक्लाष्टमी की रात थी। गुनगुनी सिहरन लिए बिल्कुल साफ मौसम वाली रात। रात ढलने को आई ही कि अचनाक आकाशीय बिजली के कड़कने और भयानक मेघ गर्जना के साथ छत पर पानी भदभदाने लगा और देखते ही देखते मूसलाधार में बदल गया। 
क्षण भर में मेरे भीतर विक्षोभ की चंद तरंगें उठीं और साथ सोयी पत्नी से लिपटकर मैं शांत हो गया।  Subscribe Now

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