एक होने की चाह में
वहां जो नदी है
है तो जल ही न?
हम बांट लेते हैं उसे
अपनी-अपनी भाषा में
और कर लेते हैं अलग
उसी को उसी से
पर क्या बांट पाते हैं सच में
हम नदी को
जब तक वह जल है।
आओ, मेरे एकांत को सजाओ
आओ, मेरे एकांत को सजाओ!
एकांत ही है
जहां न कोई वर्जना रहती है
और न वास ही होता है किसी अपने....
