जिगोलो
शहर की नियॉन लाइटें मुझे नाम लेकर नहीं पुकारतीं,
वे मुझे केवल कमरे के नंबर से पहचानती हैं।
मेरी जेब में चाबियों का एक गुच्छा, एक इत्र की शीशी और अनगिनत अनकही खामोशियां हैं।
लिफ्रट हर बार ऊपर चढ़ती है, लेकिन मैं हर बार थोड़ा-थोà¥....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।