कृष्णा प्रीति एआर.

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में स्त्री के सांस्कृतिक प्रतिरोध

सारांश 
नारी का अस्तित्व पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में प्रायः दबी हुई स्थिति में रहा है। सदियों से नारी के अस्मिता बोध, स्वत्वबोध और स्वतंत्रता की आकांक्षाएं पितृसत्तात्मक संरचना में संकुचित और दमनात्मक रही हैं। लेकिन आज नारी ने यह जागरूकता प्राप्त कर ली है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उसे अपनी गरिमा और स्वत्व का बलिदान नहीं ....

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