अजय चौधरी

‘रश्मीरथी’ के 75 वर्ष और कर्ण का आत्ममंथन

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का खंडकाव्य अपने रचनाकाल के 75वें वर्ष के आंकड़े को पार कर प्लेटिनम जुबली में प्रवेश कर गया है। कोई भी रचना जब अपने समय के साथ समकालीनता को समेटे आगे बढ़ती है, तो वह कालजयी रचनाओं में शामिल हो जाती है। आज की वर्तमान स्थिति का आकलन और संघर्ष की जो मिसाल हम देख पाते हैं, वह ‘रश्मीरथी’ में पूरी तरह मौजूद है। रचना अपनी प्रासंगिकता तब खो देती à¤....

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