कोई-कोई दिन भिक्षुक की तरह फटे-मैले कपड़े पहने हुए जिंदगी की दहलीज पर आ खड़ा होता है और थोड़ी सी उपलब्धि की भीख मागते हुए यूं ही गुजर जाता है।
आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था।
मित्र सतीश जमाली के लिए खरीद कर रखी ‘पाखी’ पत्रिका का ज्ञानरंजन वाला विशेषांक कई दिन से मेरी ओर आस भरी नजरों से देख रहा था। इधर सतीश जमाली के तीन-चार बार कॉल भी आ चुके थे- ‘‘अ....
