साहित्य, भाषा में प्रेम का प्रतिमानीकरण है
उन्होंने धर्म खड़े किये
वे प्रेम को टालते रहना चाहते थे
मैं जिन से प्रेम कर सकता था
उनके प्रति बैराग जगा कर
मुझ में वे एक भक्त को गढ़ते रहे
बांटते रहे मेरा ही चढ़ाया प्रसाद
कहते रहे, देखो!
यह तुम पर ईश्वर की करुणा बरस रही है
करुणा का पता नहीं, पर एक दिन मुझे लगा
मैं प्रेम म....
