प्रार्थना करती औरतें एकाग्र नहीं होती
वे लौटती हैं बार-बार अपने संसार में
जहां वे प्रेम करती हैं
प्रार्थना में वह बहुत कुछ कहती है
उन सबके लिए
जिनके लिए बहती है वह हवा बनकर
रसोईघर में भात की तरह
उबलते हैं उसके सपने
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।