तुम्हारी बातों का ख़जाना है मेरे पास
तुम्हारी अनुपस्थिति में गुनगुनाते हुए
गवाक्ष से आती ओढ़ लूंगी कार्तिक की कच्ची धूप
इंतजार की देगची पर पकने दूंगी थोड़ी उम्र
तब जेठ की दुपहरी में रखूगी कदम
यूं भी कर लूंगी धूप में सफेद बाल
इस तरह मुहावर....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।