आज सालों बाद गाँव जाना हुआ
बाल सखी नलिनी से मुलाकात हुई
आई थी वो अपनी माँ की अंतिम क्रिया में
जार-जार रोते हुए मेरे गले लग गयी
कहा उसने मायका तो माँ तक ही
रह जाता है प्रिया,
भाई तो पटीदार से होते हैं
माँ सा स्नेह फिर कौन किसे देता ....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।