अपूर्व

डरा हुआ लोकतंत्र

मेरी समझ से लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान चुनाव नहीं होते, संसद नहीं होती और न ही संविधान की मोटी किताब। लोकतंत्र की असली पहचान है वह कि असहमति को कितना सह पाता है और उससे भी आगे बढ़कर यह कि वह अपने ऊपर उठी हंसी को कितना सह पाता है। व्यंग्य लोकतंत्र का अपमान नहीं होता, वह उसका आईना होता है। जिस समाज में कार्टून से सत्ता असहज हो जाए, जिस व्यवस्था में किताबें संकट बन जाएं और संसदी....

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