तत्कालीन संपादक

कथाकार के  डेड एंड  तक पहुंची कहानियां

ज्ञानरंजन पर केंद्रित ‘पाखी’ के सितंबर, 2012 अंक में प्रकाशित ‘हंस’ के तत्कालीन संपादक और प्रख्यात विचारक राजेंद्र यादव संग यह बातचीत ज्ञानरंजन होने के महत्व को बहुत निष्पक्षता के साथ सामने रखती है। 


नई कहानी के बाद जो साठोत्तरी कहानी आई दोनों के मूल स्वर में क्या फर्क था? खासकर कथ्य में। और जो साठोत्तरी कहा....

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