मुकेश कुमार

नेशन फर्स्ट

मंगलवार की सुबह थी। सर्दियां विदा ले रही थी मगर हल्की ठंड की परत अभी पूरी तरह टूटी नहीं थी। आसमान अपने धुंधलके के साथ बेचैन था, मानो वह खुली हवा में सांस लेना चाहता हो। पेड़-पौधे अनमने से खड़े थे। उन्हें किसी आगंतुक का इंतजार था। पता नहीं नए मौसम का या किसी और का।
सड़कों पर चहल-पहल शुरू हो गई थी। वाहनों का शोर लगातार बढ़ता हुआ चीखों में तब्दील हो रहा था। हड़बड़ाए से, बौखलाए से ल....

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