अनवर सुहैल

काश! मैं तुम्हारे साथ रहती

राजीव के मकान की चाभी उर्मि के हाथ में थी। उर्मि को ऐसा लग रहा था जैसे उसके हाथ में लोहे की एक ठंडी चाभी नहीं, बल्कि राजीव की उंगली पकड़ी हुई हो। पापा की उंगली की तरह, छोटी-सी थी वह, जब पापा की उंगलियां ज़बर्दस्ती पकड़कर उन्हें घर से बाहर खींच ले जाती थी। पापा उसे आस-पास से घुमा भी ले आते। सड़क के किनारे बसी हैरतअंगेज़ दुनिया की तरफ इशारा कर, न जाने क्या-क्या समझाया करते। नन्हीं उर्....

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