प्रवाह
गजब का संवेग
लेकर चलती है कविता
धड़धड़ाती है, थरथराती है
अहम-वहम के
किस्सों को अपने संग
बहाकर ले जाती है कविता
इस प्रवाह में बह जाते हैं
बड़े-बड़े कालखंड
भीमकाय शिलाएं
गुमान की, विश्वासघात की
कहने को सत्ता को प्रभावित
नहीं कर पाती
एक छोटी-सी कविता
मगर यह भ्रम है तुम्हारा
सीधे दि....
