अलोक कुमार 

आलोक कुमार की कविताएं

निकोलाइ गोगोल के लिए 

जलकर राख हो गए हैं 
गेहूं के खेत

तुम्हारे पूर्वजों की कब्रें 
ढकी हैं बारूद और कंक्रीट से, 
वे सारी स्मृतियां,  
गांव के बूढ़े-बुजुर्ग, बच्चे,
भूत-प्रेत की कहानियां, 
कहावतें, किस्से,
सब कुछ चीख-पुकार, 
विस्थापन, बलात्कार
और धुएं में तब्दील हो गई हैं।

निकोलाइ! ....

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