मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा।
मैं किसी साहित्यिक परिवार से भी नहीं आता।
मैं किसी साहित्यिक परिवेश में नहीं पला-बढ़ा। मेरे घर में कोई साहित्य का पाठक भी नहीं रहा। मेरे काकू और नूनू बाबा भी धार्मिक ग्रंथों तक ही सीमित रहे थे। मेरे ननिहाल में भी कोई साहित्यिक अभिरुचि वाला नहीं था, बल्कि ननिहाल वाले जमींदार लोग थे जो शतरंज, चौपड़, नाच-गाना और शिकार के शौकीन ल....
