(रूसी भाषा के अप्रतिम उपन्यास बाबर के हिंदी अनुवाद की यह समीक्षा कोई तीस बरस पहले लिखी गई थी। इस उपन्यास की जिस तरह हिंदी में चर्चा होनी चाहिए थी, दुर्भाग्यवश वैसी नहीं हुई। आज यह उपन्यास और इस पर लिखी हुई यह टीप अधिक प्रासंगिक है। इसलिए इसे प्रकाशित किया जा रहा है।)
इतिहास तथ्यात्मक होते हए भी झूठ का पुलिंदा हो सकता है और साहित्य कल्पना पर आधारित होते हए भी ऐतिहा....
