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अपूर्व जी, आपके संपादकीय वैचारिक दृष्टि से मजबूत और तर्कसंगत होते हैं। यह सोचने को मजबूर करते हैं कि हम और बेहतर हो रहे या गिर रहे?
मेरी प्रिय पत्रिका ‘पाखी’ के प्रारंभ से ही जुड़ा रहा हूं। प्रेम भरद्वाज जी के समय एक अंक में पत्र, आलोचनात्मक लेख और कविता तीनों एक साथ प्रकाशित हुई। जबकि मेरा प्रेम जी से फ़ोन तक पर संपर्क नहीं था। डाक से हाथ से लिखी सामग्री भे....
