कमरे में घुसते ही मालविका पर्स को पलंग पर उछालते हुए ड्रेसिंग टेबल के सामने जा खड़ी हुई। आवेग और रोमांच का मिलाजुला एहसास! सांसों का अस्वाभाविक आरोह-अवरोह! खोजी नजरें आईने के भीतर अवतरित हो आयी मालविका की देह का मुआयना करने लगीं। आंचल नीचे ढलक गया। पुष्ट उरोजों की छांव तले छुईमुई-सी नाभि को निहारते हुए लगा जैसे नाभि की कोह काफी सुरंग के भीतर से महीन किलकारी गूंजी हो--- मां!....
