अनामिका अनु

रसूल का गांव

 

रसूल के गांव के समतल छत पर
बैठी चिडि़या
कभी-कभी भोर के कानों में
अवार में मिट्टी कह जाती है।

शोर गुल के बीच
सिर्फ दो शब्द नसीहतों के 
कह जाते हैं रसूल, कानों में।
मास्को की गलियों में उपले छपी दीवारें नहीं है
कहते थें रसूल के अब्बा

आंखों में रौशनी की पुडि़या खोलती 
त्साता गांव की लड़कियां
आज भी आती होंगी....

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