सलिल सुधाकर

सिने-सवांद

फिल्मों को अब परिवार नहीं चाहिए

 

भारतीय सिनेमा का चेहरा धीरे-धीरे कई मायनों में बदल गया है। कभी-कभी जब पुराने दौर की कोई उल्लेखनीय फिल्म छोटे परदे पर या यू-ट्यूब पर देखने को मिल जाती है, तो अनायास ही दिख जाता है कि विगत तीस साल से पहले की फिल्मों और आज के दौर की फिल्मों में कितना बड़ा अंतर आ गया है। इसमें कोई शक नहीं कि सिनेमा-निर्म....

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