अमृतलाल नागर जिन्हें मैं बाबू जी कहकर संबोधित करती थी, आज भी जब याद आते हैं तो एकाएक उनके ठहाके कानों में गूंज उठते हैं। जिंदादिल, उदार मनस, हंसता चेहरा, मुस्कुराती आंखें- उनकी ये खूबियां सिलसिलेवार आंखों में लहरा उठती हैं।
उनसे मेरी पहली मुलाकात मेरे शोध कार्य के दौरान सन् 1977 में हुई थी। आगरा व....
