तरसेम गुजराल

‘‘एक अफसाना निगार का कम-से-कम इतना कर्त्तव्य है कि वह आवश्यक या मजबूरी से सद्गुण पैदा करें, यह नहीं कि उसके अनुकूल प्रयासों के लिए दूसरे उसकी यंत्रणा भोगें।’’ (राजू शर्मा के उपन्यास ‘पीर नवाज का वाचक)
‘‘हम कारीगर थे।
यही की आग में तपते हमारे चेहरे कभी बर्तन बनाते थे कभी चूड़ी।
कभी लैंप का शीशी’’ (अरुण देव की कविता ‘औजार और हथियार’ का अंश)
‘‘एक ....

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